कविता · Reading time: 1 minute

सच का आइना

सच का आइना क्या दिखाया उन्हें तिलमिला उठे वो।
जरा सा सच क्या कहा एकदम से बिलबिला उठे वो।

सच दिखाने से कोई सरोकार नहीं बस पैसे चाहिए उन्हें,
पैसे मिलते ही झूठ को सच बनाने को चिल्ला उठे वो।

खरीददार का इंतजार था बिकने को तैयार बैठे थे,
चंद कागज के टुकड़े क्या दिखाए दुम हिला उठे वो।

ये किसी और का नहीं मेरे देश के चौथे स्तंभ का सच है,
लगा दाग खुद के दामन पर तो सुर में सुर मिला उठे वो।

इस चौथे स्तंभ ने देश को खोखला करने की ठान ली है,
देश के होते देख टुकड़े गद्दारों ज्यूँ खिलखिला उठे वो।

अब उम्मीद बंधी है “सुलक्षणा” जैसे चंद कलमकारों से,
कलम की रौशनी से अँधेरे रास्ते थे जो झिलमिला उठे वो।

©® डॉ सुलक्षणा अहलावत

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