सच और झूठ

सच और झूठ
#दिनेश एल० “जैहिंद”

पीछे छूट गई सच बचा रह गया अब झूठ ।
रिश्ते-नाते, यारी-दोस्ती सब हो गए ठूँठ ।।

झूठ की चादर ओढ़ सच बैठ गई सरे-आम ।
अच्छे भले पड़ चक्कर में फिर हुए बदनाम ।।

सच के आसमां पर है झूठ की काली छाया ।
नये लोगों को सच से ज़्यादा झूठ ही भाया ।।

न्याय के तराजू पर जब भी सच-झूठ मिले ।
झूठ का पलड़ा भारी हार पड़ी सच के गले ।।

सच्चा सच के लिए मरे व झूठा झूठ के लिए ।
सच्चाई के लिए सच्चा कितने कड़वे घूँट पिए ।।

एक झूठ की खातिर लोग सौ-सौ झूठ बोते ।
कठघड़े में जाके बनते यही हरिश्चंद्र के पोते ।।

शराफत का चोला डाले झूठे सारे घूम रहे ।
सच्चाई अब तो हवा हुई झूठ की हवा बहे ।।

झूठ की चक्की में सच को है पीसा ही जाना ।
सत जमाना बीत गया आया ऐसा जमाना ।।

कहे कवि “जैहिंद” चहुँओर झूठा तानाबाना ।
कैसे झूठी गलियों से होगा तेरा आनाजाना ।।

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दिनेश एल० “जैहिंद”
15. 04. 2017

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