सच्चा रिश्ता

रिश्तों को देखा मौसम के रंग की तरह बदलते हुए,
मोतियों को देखा “प्यार की माला ”से बिखरते हुए ,
आदमी को देखा नफरत के चक्रव्यूह में फंसते हुए,
दिये की लौ को देखा भयंकर तूफानों में जलते हुए I

“वफ़ा की दरिया” में आंसुओं का सैलाब देते गए वो,
“प्यार के गुलशन” में नफरत के बीज बोते गए वो ,
फ़रेब की डगर के सहारे अपनी मंजिल चुनते गए वो ,
प्यार के समंदर को जुल्म की नाव से पार करते गए वो I

“राज” टूटकर भी “जहाँ ” में उम्मीद की मशाल जलाता गया ,
“ निष्कपट प्रेम ” की पतवार से जीवन की धारा में चलता रहा,
सच्चे रिश्तें से “परम पिता” के पुष्पगुच्छ का एक पुष्प बनता गया ,
“इंसानियत का दामन” थामकर “प्रभु की नगरी” की ओर बढता गया I

देशराज “राज”
कानपुर

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