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सच्चा देशभक्त (कहानी)

Abhinav Saxena

Abhinav Saxena

कहानी

October 11, 2016

सच्चा देशभक्त

बिंदु जरा देख दिए सुख गए होंगे एक बोरे में भरकर रख दे शाम को ईंधन लाऊंगा तब पकाने रख देना। कुम्हार श्यामू ने अपनी बेटी बिंदु को आवाज लगाई।
जी बापू पहले आटा गूंथ लूं फिर रखती हूं।
श्यामू अपने गाँव के सबसे काबिल कुम्हारों में से एक था। बाकी सारे कुम्हार अपना काम छोड़कर शहर में कोई और काम करने चले गए। पर श्यामू नही गया। उसका मानना था कि अगर सबने दिए पुरुये आदि बनाना बंद कर दिए तो दीवाली का त्यौहार कैसे मनाया जायेगा। दीवाली आने वाली थी सो झटपट वो ढेर सारे दिए बनाने में लगा था।
अरे क्या करोगे इतने दिए बनाकर बिकते तो हैं नही, देखा था न पिछली दीवाली पर आधे दामो मेँ बेचने पड़े थे जिससे ईंधन का खर्च भी नही निकलता है। श्यामू की बीबी ने ये बात कही तो श्यामू थोड़ा सोंच मैं पड़ गया। फिर कुछ सोचते हुए बोला कि, देखना वो तो पिछली दीवाली थी इस बार उसके दिए धड़ल्ले से बिकेंगे और इतने बिकेंगे की उनके पास दियो की कमी पड़ जायेगी।
इंसान के पास जबतक उम्मीद है तबतक वो कोई भी जंग न सिर्फ लड़ सकता है बल्कि जीत भी सकता है।ये बात श्यामू को भलीभांति मालूम थी पर कही न कही वो मन ही मन में डर भी रहा था। कही इस बार भी चाइना का माल बाज़ार में ज्यादा बिका तो, इस बार भी पिछली बार की तरह दिए कम बिक पाये तो??
दोस्तों ये भी हमारे लिए शर्म की बात है कि जिन स्वदेशी चीजो से हमारे त्यौहार शुरू हुए थे उन सब चीज़ों को भूलकर हम सस्ते और गैर स्वदेशी बस्तुओं को अपनी मातृभूमि के गरीब कुम्हार, लोहार के पेट से काटकर बड़ी बड़ी कंपनियों के खाते में जमा करते हैं।।
यही सब सोचता हुआ श्यामू ईंधन के लिए लकडियो की टाल पे पंहुच गया।
क्या श्यामू इस बार फिर से दीवाली पे दिए सजाने का सोच रहे हो का।टाल के मालिक नें पूछा।
हां पर अबकी बार सोच ही नहीं रहें हैं, अबकी बार सबसे ज़्यादा बिक्री मेरे दियो की ही होगी।श्यामू उत्सुकतावश बोला।
अरे श्यामू चाइना के माल के आगे कौन ख़रीदेगा तुम्हारे ये दिये मेरी बात मानो जितने पैसे दिये पकाने मेँ लगाते हो इतने ही पैसों का चाइना का माल ले आओ खूब बिकेगा।टाल के मालिक ने अपनी कीमती राय आखिर श्यामू को दे ही डाली।
अरे नही भैया चाइना का माल बेचने से कोई फायदा नहीं, चलता है नहीं फिर क्यों चन्द रुपयो के लिए अपना पुश्तैनी काम छोड़े और अगर न चले तो गालियां खाओ सो अलग।श्यामू बोला।
मानेगा तो तू है नही। अच्छा बोल कितनी लकडियॉ दे दूँ? टाल वाले ने पूछा।
दो गढ्ढहर दे दो इतने मे काम हो जायेगा, पर एक गढ्ढहर के पैसे बाद में ले लेना। श्यामू विनम्रता से बोला।
ठीक है ले जा पर पैसे टाइम से दे देना।
ठीक है।
लाकड़िया लेकर श्यामू घर पंहुचा। शाम हो चली थी, अरे सब्ज़ी लाये क्या । श्यामू की बीबी ने पूछा।
अभी लाता हूँ।कहकर श्यामू बाजार की तरफ चल दिया।
बाज़ार मेंदेखा तो वह जैसे सन्न रह गया।हर तरफ बड़ी बड़ी झालरें, चाइना के दिए और उनपर लगी सस्ते की मोहर देखकर श्यामू के भीतर क्या टूटा ये शायद वही जानता होगा।।पिछले दो महीनों में बचाई जमा पूँजी घर के खर्च और दियो का सामान लाने में खर्च हो गयी। खैर श्यामू सब्ज़ी लेकर घर पहुँचा तो देखा की बिंदु अलाव लगा चुकी है। बापू आप दिए पकने रख दो मैं तबतक खाना बना लेती हूं। बिंदु बिटिया ने हाथ से सब्जी लेते हुए कहा। श्यामू को लगा की ईश्वर ने उसके साथ एक अच्छा काम किया कि उसके घर में बेटी दी। बेटियां जो शायद बिना कुछ भी कहे बहुत कुछ समझ जाती हैं, एक तरफ पूरी दुनिया और एक तरफ उसकी बेटी बिंदु जो उसके दिए बेचने के मिशन को लेकर पूरी तरह से उसके साथ थी।
श्यामू ने अलाव में दिए डाले और सुबह का इंतज़ार करने लगा। आखिर अगले दिन दीवाली जो थी।।
अगले दिन श्यामू जल्दी उठा तैयार होकर सर पे दियो से सजी एक डलिया लेकर बाजार की तरफ चल दिया, सुबह 9 बजे तक बाजार बहुत धीमा चल रहा था। उसके पड़ोस में एक लड़के ने लगाई अपनी चाइना की दुकान से निकलकर कहा , बाबा आजकल चाइना का जमाना है कोई नहीँ ख़रीदेगा आपके मिटटी के दिए।
श्यामू मुस्कुरा दिया। और कोई जवाब भी तो नही था उसके पास।
धीरे धीरे बाजार बढ़ने लगा उसने महसूस किया कि अचानक उसकी दुकान पर दियो की बिक्री बढ़ गयी थी। पुरे बाजार में दियो की दुकान सिर्फ एक ही थी। और वो थी श्यामू की दुकान ।
दरअसल ब्रह्मपुत्र नदी का पानी रोक लेने की वजह से गुस्साए लोगो ने इस बार चाइना का माल न खरीदने का फैसला किया था।।
शाम तक जैसा की श्यामू ने सोचा था वाकई उसकी दुकान में दियो की कमी पड़ गयी थी।। चाइना का माल बेचने वालों की दुकानें सजी की सजी रह गयी।। आप ही बताइए कि चाइनीस बस्तुओं का ब्यापार न करके जो देश की धरोहर (जो की मिटटी के दिए हैं चाइना के दिए नही) को बचाये रखता है, क्या उसे एक “सच्चा देशभक्त” नहीं कहेंगे।।
दोस्तों हो सके तो इस दीवाली चाइनीस बस्तुओं को अलविदा कहे।
धन्यवाद
लेखक:- अभिनव सक्सेना (8126661493)

Author
Abhinav Saxena
मैं कोई लेखक नहीँ हूँ साधारण सी बात कहने वाला एक आम इंसान हूँ।।
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