Jun 26, 2018 · कविता

संस्कृति तुम कहां हो...

संस्कृति तुम कहां हो,
क्या कहा,
संस्कृति की हत्या हो गयी,
अरे चुप,
ऐसे कैसे हो सकता,
अभी तो,
टेलिविजन पर, खूब तेज,
गप्पे हांके जा रहे थे,
हां मैने सुना था,
वह भारत की संस्कृति को,
बचाने की बात कर रहे थे,
और तुम कह रहे,
कि संस्कृति मार दी गयी,
क्या फालतू, बोल रहे,
बोलो न तुम झूठ बोल रहे,
बोलो संस्कृति जिन्दा है न,
बोलो प्लीज बोलो न,
क्यों चुप हो तुम,
कुछ बोलते क्यो नहीं,
तुम्हें, सुनायी नहीं दे रहा क्या,
मैं तुमसे ही कह रहा।
क्या कह रहे मुझसे,
क्यो कह रहे मुझसे,
तुम्हें बता रहा तो,
सुनते क्यों नहीं,
सच में संस्कृति मार दी गयी।
क्या कहा किसने मारा,
क्यों मारा,
डिबेट में चिल्ला चिल्ला कर तो,
सभी संस्कृति को,
बचाने के लिए लड़ रहे थे,
फिर कैसे मार दी गयी,
अरे आनन्द तुम मूर्ख हो क्या,
टेलीविजन में जिस,
संस्कृति को बचाने की,
बात हो रही थी,
वह राजनैतिक संस्कृति थी,
यह संस्कृति तो,
मां के कोख की निर्मल मोती थी,
पापा की दुलारी थी,
दादी दादा के आंखों की,
लाली थी,
इस पर डिबेट से क्या फायदा,
यह नेताओं के लाभ की,
संस्कृति नहीं थी,
यह वोट की संस्कृति नहीं थी,
यह तो थी, एक नाम की संस्कृति,
ऐसी संस्कृति से वोट,
थोड़े बिगड़ते कि उन्हें सिकन हो,
ऐसी संस्कृति तो मरती रहती है,
असल में जब सरकार में,
जब कोई व्यक्ति होता है,
तो ऐसी मौतों पर,
दर्द नहीं होता,
क्योंकि संस्कृति की बात,
सिर्फ उनके जुबान पर रहती है,
असल में वे मरे इंसान होते हैं,
वह भला संस्कृति का,
परिभाषा क्या जाने,
ऐसी घटनाओं पर,
कैसे फटता है कलेजा किसी का,
वे बेशर्म दर्द क्या जाने।।

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