मुक्तक · Reading time: 1 minute

माँ/संसार

स्वार्थी संसार , सब जन बुद्धि के कोहिनूर है |
आत्मा की किसे चिंता, जग का मन भरपूर हैं |
माँ, सघन जीवन-प्रदाता- प्यार का अनुपम सगुन|
शेष सब ढोते समय के शेर जैसे शूर हैं|

माता तेरा ऋणी यह, सचमुच असत् संसार है|
माँ अमल पोषण की देवी,प्रीतिमय आधार है |
आप बिन सारा ज़माना, पत्ता सूखी डाल का |
मातु नहिं तो बाल-जीवन में नहीं परिवार है |

बृजेश कुमार नायक
“जागा हिंदुस्तान चाहिए” एवं “क्रौंच सुऋषि आलोक” कृतियों के प्रणेता

उर=हृदय

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