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संवेदनाएं पड़ी मृत है!!

क्यो ढोते रहें ये संवेदनाएं
होती है ये लाश की बोझ सी भारी
किसी के परेशानी किसी के दुख
को कंहा कोई कम कर पाया
खेलते खेलते संवेदनाओं से
संवेदनाएं आज पड़ी मृत है
चल पड़े हम सब उस पथ पर
जिस पर हरेक कोई अकेला
दूसरे के सुख से दुखी है तू
दुखी तू तो मैं मुस्कुराता
मेरे उर की आहें तुझे तरंगित करती
तेरे उच्छवास मेरे हृदय को ठंडी करती
इस खेल में जग सारा व्यस्त है
खेलते खेलते संवेदनाओं से
संवेदनाएं आज पड़ी मृत है
दुख देख संवेदनाएं पल भर जगता है
मन व्याकुल क्षण में, क्षण में चंचल हो जाता है
संवेदनाएं जगती भी है तो सिर्फ शब्दों तक
भाव भंगिमा का अभिनय सबको आता कंहा है
मदद या साथ देना, सोचना भी शायद पाप है
खेलते खेलते संवेदनाओं से
संवेदनाएं आज पड़ी मृत है
संवेदनाएं आज बनी व्यापार सा
दूसरे के दुख का शब्दो बयानों से होता सौदा
जंहा लाभ हो वहां बहती है अश्रुधारा
वर्ना आंखे वेदनाहीन है मौन है
खेलते खेलते संवेदनाओं से
संवेदनाएं आज पड़ी मृत है

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रीतेश माधव
रीतेश माधव
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