संविधान पर थूका है।

भारत माँ की आन बान औ स्वाभिमान पर थूका है।
अलगावी नेताओं ने अब संविधान पर थूका है।
अपनी दिल्ली चुप है फिर भी जाने किस मजबूरी में।
सिंह समक्ष सियारों ने ये आसमान पर थूका है।

प्रदीप कुमार।

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पुलिंदा झूठ का केवल नहीं लिखता मैं गजलों में। rnहजारों रंग ख्वाहिश के नहीं भरता...
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