संयुत

*संयुत छंद में कुछ मुक्तक*

*विधान-*
[सगण जगण जगण गुरु ]
(112 121 121 2)
4 चरण,
1,2,4 चरण समतुकांत
तथा तीसरा चरण अतुकांत।

इतनी अजीब ये’ बात है।
कितनी घनेरी यह रात है।
दिन रात करूं अब याद मैं।
दिल में छुपा जज़बात है।।1

किस से कहूं दिल की लगी।
इक आस सी मन में जगी।
सुन लो ज़रा इक बात को।
यह बात है रस में पगी।2

दुनिया बड़ी बलवान है।
रचती नये प्रतिमान है।
उतरे खरा जिनमें को’ई।
सबसे बड़ा धनवान है।3

सुन दासतां हमरी अभी।
जग जाय भाव ते’रे कभी।
मत बैठना चुपचाप यूं।
अरमान पूर्ण करो सभी।4

प्रवीण त्रिपाठी
12 जनवरी 2016

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