संबंध

“ओह छ:बज गए और माँ ने भी नहीं उठाया।”
“इतनी देर तक कैसे सोती रह गई मैं?माँ कहाँ है।”बड़बड़ाती हुई श्रद्धा कमरें से बाहर भागी।रोज की तरह न माँ आज बाहर अखबार पढती दिखी और न मंदिर से धूप की सुगंध आई।वह परेशान हो उनके कमरें में गई।देखा तो वह बेड पर लेटी हुई थी।
“माँ !आप ठीक तो हो?”
“हाँ!श्रद्धा।”
“,फिर आज आप अब तक…और मुझे भी नहीं उठाया।”
“बस बेटा आँख नहीं खुली।”
“पाँच साल में पहली बार आपको ऐसे लेटे हुए देख रही हूं माँ!कुछ तो हुआ है।”कह कर श्रद्धा ने माँ के सर पर हाथ रखा तो वह जल रहा था।
“इतना तेज बुखार!माँ मुझे क्यों नहीं जगाया… हे भगवान.. और बोल रही हैं कुछ नहीं हुआ।”
“अरे!बुखार ही तो है।”
“क्या बुखार है!इतना तेज बुखार, रूको अभी चाय बना कर लाती हुँ सबसे पहले दवाई लो और फिर डॉक्टर के पास चलेंगे।”
“अब कैसा लग रहा है माँ?”सर सहलाती हुई श्रद्धा ने पूछा।
“मैं ठीक हूँ लेकिन तुझे आज ऑफिस नहीं जाना?”
“नहीं,आज आपके साथ रहूंगी।”
“क्यों?अब ठीक हूँ ना मैं।तुम जाओ।”
“बिल्कुल नहीं।कोई ठीक नहीं हो।”
“अरे मर नहीं रही पगली मैं।मामूली बुखार था।”
“दोबारा ऐसा मत कह देना माँ!आपके बिना मैं अधूरी हूँ।”
“श्रद्धा!”
“हाँ माँ!”
“तू कैसी बहू है जो सास से झगड़ती भी नहीं।कम से कम मुझे एहसास तो होने देती कि मैं सास बन गई।निंदा करने का अधिकार छीन लिया तुमनें।”
“माँ,बहू होती ही हैं अधिकार छीनने के लिए।आपको पता भी नहीं चलता कब वे आपके दिलोदिमाग पर छा जाती हैं और आपकी बेटियों का अधिकार छीन लेती हैं आपकी बेटी बनकर।पता चला आपको?”श्रद्धा ने हँसते हुए कहा।”चलिए अब ज्यादा बातें नहीं करनी चुपचाप आराम कीजिए,मैं इन्हें फोन कर देती हूं।”
“हाँ,यह बात तो सच है कि पता नहीं चला कब तुम मेरी दादी माँ बन गई।”
“कुछ संबंध ऐसे ही होते हैं माँ।जिन्हें जोड़ने के लिए रक्त की जरूरत नहीं।”

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