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संज्ञा

Shubha Mehta

Shubha Mehta

कविता

August 27, 2016

जी हाँ, संज्ञा हूँ मैं।
व्यक्ति या वस्तु?
कभी-कभी ये बात
सोच में डाल देती है
रूप है, रंग है
आकार भी है
दिल भी ,दिमाग भी
फिर भी कभी -कभी
लगता है जैसे
वस्तु ही हूँ मैं
जिसे जहाँ चाहे रख दो
मन हो उठा लो
या, शो केस में सजा लो
या फिर उठा के डाल दो बाहर
इक धडकता दिल
तो है सीने में
पर धडकन किसी को
सुनाई न देती
इच्छाएँ,आशाएँ,उम्मीदें भी हैं
जो किसी को दिखाई न देती
अब तो खुद ही भ्रमित हूँ
कि क्या हूँ मैं
निर्जीव या सजीव
बस,संज्ञा हूँ मैं ।

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Author
Shubha Mehta
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