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संजीवनी (डॉ. विवेक कुमार)

Dr. Vivek Kumar

Dr. Vivek Kumar

कविता

June 7, 2017

बहुत कुछ खोने के बाद भी
खुश हूँ मैं
यह सोच कर कि मेरे पास कुछ खोने को था तो सही ।

अपनों और परायों से
अनगिनत ठोकरें और धोखे
खाने के बावजूद
खुश हूँ मैं
क्योंकि दूसरों के दु:ख से दु:खी और
सुख से हर्ष महसूस करने के लिए
एक संवेदनशील दिल है मेरे पास।

सत्य को असत्य से मिली
अनवरत पराजयों के बावजूद भी खुश हूँ मैं सत्य की अंततः शाश्वत जीत की
सोंधी-सोंधी सुगंध की कल्पना कर।

जीवन की तमाम अनिश्चिंतताओं और जटिलताओं के बावजूद खुश हूँ मैं
क्योंकि उनसे लड़ने के लिए
तुम्हारी प्रेरणा रूपी अमोघ शक्ति और जिजीविषा है मेरे पास।

जीवन के गूढ़ रहस्य और उसकी तमाम
विषम परिस्थितियों के बीच भी
खुश हूँ मैं
क्योंकि मेरी स्मृतियों के झरोखों से झाँकती तुम्हारी मुस्कुराहट की संजीवनी है मेरे पास।

तेली पाड़ा मार्ग, दुमका, झारखंड।
(सर्वाधिकार सुरक्षित)

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Author
Dr. Vivek Kumar
नाम : डॉ0 विवेक कुमार शैक्षणिक योग्यता : एम0 ए0 द्वय हिंदी, अर्थशास्त्र, बी0 एड0 हिंदी, पी-एच0 डी0 हिंदी, पीजीडीआऱडी, एडीसीए, यूजीसी नेट। उपलब्धियाँ : कादम्बिनी, अपूर्व्या, बालहंस, चंपक, गुलशन, काव्य-गंगा, हिंदी विद्यापीठ पत्रिका, जर्जर-कश्ती, खनन भारती, पंजाबी-संस्कृति, विवरण पत्रिका,... Read more
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