श्रृंगार

श्रृंगार शब्द सुनते ही मुझे एक कहानी याद आ जाती है। वो कहानी मेरी बड़ी बहन की है। तो चलिए सुनते है वो हंसीदार बचपन का श्रृंगार। एक दिन मम्मी मेरी दीदी को नीचे छोड़ कर कपड़े सूखाने छत पर चली गयी। मेरी बहन को शायद हनुमान जी कुछ ज्यादा ही पसंद थे। वो पता नहीं कैसे अलमारी पे चढ़ गयी। वहाँ पर मम्मी ने सिन्दूर का बड़ा सा एक डब्बा रखा था। दीदी ने डिब्बा खोला और अपने उपर उझल लिया।और फिर मम्मी के सारे मेकअप किट का तो कबाड़ा ही निकाल दिया। और फिर सारे डिब्बे एक-एक कर के जमीन पर फेकना शुरु कर दिया। मम्मी ने जोड़ों की आवाज़ सुनी तो घबरा गयी। वों दौरी-दौरी निचे आयी। और दीदी की कारिस्तानी देख के गुस्से वाला मुँह बना और फिर पापा को बुलाया। दीदी डर गयी। उसे लगा की अब उसे मार पड़ने वाली है। पापा के आते ही दीदी ने रोनू जैसा मुँह बना लिया। पापा और मम्मी तभी ठहाके लगा के हँसने लगे। दीदी भी अपनी प्यारी सी आवाज़ में हँसने लगी। मम्मी ने उसे गोदी में उठाया और कहा ‘ लगता है बड़े होकर मेकअप ये बड़े चाओ से करेगी।’ आज मेरी बहन दसमीं में पढ़ती है। उसे मेकअप का तो बिलकुल भी शौख नहीं है। और जब भी मम्मी हमें ये कहानी सुनाती है। मैं तो बहुत हस्ती हूँ और उसे खूब चिढ़ाती हूँ। दीदी भी हसती है और मुझपे तब बहुत गुस्सा होती है। वैसे आपको एक मजेदार बात बताना तो मैं भूल गयी। मैंने बचपन में ऐसा कोई काम नहीं किया मगर मुझे मेकअप का बहुत शौख है। पर मेरी बहन ने बचपन में कई बार ऐसा किया है। एक बार तो उसने आटे से ही भूत जैसा मेकअप किया था। मगर उसे मेकअप का बिलकुल शौख नहीं है।
-वेधा सिंह
-कक्षा -पांचवीं

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