श्रृंगार रस

भाव रूप उर में बहे, जो बनकर रस धार।
सभी रसों का मूल रस, रसपति है श्रृंगार।।१

सब रस में श्रृंगार रस, कहलाता रस राज।
जिसने सदियों से किया, सबके दिल पर राज।।२

कविता में श्रृंगार रस, मर्म हृदय का घोल।
जो अब तक उर में छुपा, दिया बात वो बोल।।३

-लक्ष्मी सिंह

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