मुक्तक · Reading time: 1 minute

श्रम की सार्थकता

*कुंडलिनी*
कण कण मधु संचित किया, लेकर सतत पराग।
मधुमक्खी का श्रम हुआ, औरों का ही भाग ।
औरों का ही भाग, समर्पित कर निज क्षण क्षण।
भरता जीवन स्वाद, श्रमिक का अर्जित कण कण।
अंकित शर्मा’इषुप्रिय’
रामपुर कलाँ,सबलगढ(म.प्र.)

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