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श्रमिक

जीवन मेरा सुखद्ध सरीखा
चाह बङी ना मैंने पाली,
आँगन चहकता बाल क्रिङा से
अर्धांगी भी है मतवाली ।

सुबह सवेरे बाँध रोटियाँ
ले हाथ कुंडी और खुदाली
दिन भर करता श्रम वेशर्म
साँझ मेरी है खूब निराली ।

जिस लगन से जाता श्रम पे
दुगनी उमंग से घर आता
बच्चों से कर हँसी ठिठोली
कांता संग नजर मिलाता ।

ना वात् सताए, ना चाप सताए
ना करनी मधुमय की निगरानी
ना चिंता मंथन लाभ हानी
रात आती नीँद सुहानी ।

भोजन मिठा लगे स्वादिष्ठ
प्यार जिमाए घर की रानी
प्रेम बढाए सौभा आँगन
नहीं चाहिए मन का पानी ।

मैं श्रमिक, शर्म मुझे है आती
नाम मेरे से ऱाजनिति गर्माती
ना चाहूँ तुमसे कुछ, फिर क्य़ो
झेंपङी मेरी, बली चढाई जाती ।

देवेन्द्र दहिया अम्बर

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