कविता · Reading time: 1 minute

श्रद्धांजलि

कश्मीर कभी न हथिया पाओगे पीठ पीछे वारों से।
आत्मबल क्षीण नहीं होगा, सुनों तुम जैसे गद्दारों से।
बहुत सही मक्कारी नापाक तेरी, पार कर गया तू तो हद
विनाश काले विपरीत बुद्धि,पाकिस्तां समर्थक जैश-ए-मोहम्मद।
अमानवीयता और बर्बरता से सना हुआ तेरा परिवेश,50 के बदले 5000 कटेंगे, मिलेंगे न ढूंढे अवशेष।
नीलम शर्मा ✍️

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