शौचालय बनवा लो

गाँव गांव की गली गली में, घर घर में लिखवा लो।
शौचालय बनवा लो बाबा, शौचालय बनवा लो।।

भोर सबेरे बेटी बहुएं खुले शौच को जाती।
गली खेत और खुली जगह में शर्म उन्हें हैं आती।।
बारह हजार सरकार दे रही, कुछ घर से लगवा लो।
शौचालय बनवा लो बाबा, शौचालय बनवा लो।।

बिटिया बोल रही पापा से घर में हो शौचालय।
जंगल झाड़ी में जाने को जी लगता हमको है भय।।
आज अभी और इसी वक्त में काम शुरू करवा लो।
शौचालय बनवा लो बाबा, शौचालय बनवा लो।।

खुले शौच पर मक्खी बैठे, गंदे पाँव हैं करती।
गंदे पाँव वही मक्खी फिर भोजन पर है धरती।।
भोजन के संग रोगाणु से हम सब को बचवा लो।
शौचालय बनवा लो बाबा, शौचालय बनवा लो।।

कुछ घर से कुछ मजदूरी से गढ्ढा गोल बना लो।
कुछ गिट्टी कुछ रेत ईट अरु कुछ सीमेंट मंगा लो।।
ईटा मिस्त्री से ईटों को जल्दी से जुड़वा लो।
शौचालय बनवा लो बाबा, शौचालय बनवा लो।।

मानो बाबा मानो बाबा कुछ अपनी भी मानो।
शासन की उपयोगी मंशा को बाबा पहचानों।।
घर में शौचालय बनवाने बाबा को मनवा लो।
शौचालय बनवा लो बाबा, शौचालय बनवा लो।।

-साहेबलाल ‘सरल’

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