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शुभ प्रभात हमारा

सुनील पुष्करणा

सुनील पुष्करणा "कान्त"

कविता

November 24, 2016

व्योम के उर से उदित
कर अठखेलियां रवि अपनी रश्मि के साथ
तुम्हे नव स्फूर्ति, नूतन ऊर्जा का दे संचार
वो क्षण तुम्हे शुभ प्रभात हमारा
निशब्द अपराह्न की एकाकी में मेरी स्मृति से
नव वधु के नूपुर सा झंकृत हो ह्रदय तुम्हारा
उस क्षण तुम्हे शुभ अपराह्न हमारा
दिवसावसान की श्यामल धुंधलका
कर त्याग सम्पूर्ण दुविधाओं, व्यस्तताओं का
हो गृह प्रत्यागमन तुम्हारा
स्नेहिल,मृदुल भावनाओं से सिंचित
उस क्षण तुम्हें सायंकाल हमारा
श्याम नभ पर कर दृष्टिपात
जब यह हो आभास
चाँद के चतुर्दिक तारे मिक्तिकहार
सदृश्य रहे हैं झिलमिला
उस क्षण तुमको शुभरात्रि मेरा
हो अनुभव मस्तक पर तुम्हे स्नेहिल स्पर्श
पलकें हों तुम्हारी निद्रालस
उस क्षण तुम्हे दिखे इंद्रधनुषी प्रेम का स्वप्न
हमारा…..

सुनील पुष्करणा

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