शीर्षक:-पहाड़ी के उस छोर

“पहाड़ी के उस छोर”
—————————
अपने आँसू
रूपी
कितने
पंकज अर्पण करती हूँ?
तुम्हारे चरणों में
गिनने
योग्य कहाँ?
हर रोज
अपने प्रेम के
दीपक
कितने
जलाती हूँ
तुम्हारे चरणों में
गिनने
योग्य कहाँ?
यह सब
उसी तरह है
जिस तरह
कोई
नादान बैठ
समुद्र के किनारे
अनगिनत
कंकड़ फेंकता है
पानी में
उसे कुछ
सुध-बुध कहाँ?
खैर!
तुम सज्जन को
अपने जीवन में
पाकर
मैं धन्य हो गई हूँ
एक किसान-सी
दिन-भर
कड़ी धूप में
परिश्रम कर
आकर
तुम्हारी छाँव तले
सो गई हूँ
इस
समय
पुरबा भी चलने
लगी है मधुर-मधुर
और मेरे मन में
तुम्हारे लिए
श्रद्धा
ले रही है हिलोर
सूर्यास्त हो रहा है
पहाड़ी के उस छोर
लालिमा
फैली है दूर-दूर
मैं उसे ही देख रही हूँ
लगाए टकटकी
घूर्र-घूर्र
और तुम
मुझे पिता तुल्य देख
मुस्कुरा रहे ~तुलसी पिल्लई

क्या आप अपनी पुस्तक प्रकाशित करवाना चाहते हैं?

साहित्यपीडिया पब्लिशिंग द्वारा अपनी पुस्तक प्रकाशित करवायें सिर्फ ₹ 11,800/- रुपये में, जिसमें शामिल है-

  • 50 लेखक प्रतियाँ
  • बेहतरीन कवर डिज़ाइन
  • उच्च गुणवत्ता की प्रिंटिंग
  • Amazon, Flipkart पर पुस्तक की पूरे भारत में असीमित उपलब्धता
  • कम मूल्य पर लेखक प्रतियाँ मंगवाने की lifetime सुविधा
  • रॉयल्टी का मासिक भुगतान

अधिक जानकारी के लिए इस लिंक पर क्लिक करें- https://publish.sahityapedia.com/pricing

या हमें इस नंबर पर काल या Whatsapp करें- 9618066119

Like Comment 0
Views 1

You must be logged in to post comments.

Login Create Account

Loading comments
Copy link to share