शीर्षक-गिरता हूँ उठता हुँ फिर संभलकर चलता हुँ..... राहुल आरेज

शीर्षक-गिरता हूँ उठता हुँ फिर संभलकर चलता हुँ…………

उन्मुक्त हो कर उड सके विचार मेरे मुझे वो आसमा चाहिये,
मन मे उठे हर कौतूहल का जबाब चाहिये।

निज पीडा का संताप लिऐ फिरता हुँ,
गिरता हुँ उठता हुँ फिर संभलकर चलता हूँ,
इस गिरने मे भी फिर उठने का संताप लिए फिरता हू। ——-–-1

बेजान सी देह बोझिल सा मन लिए फिरता हुँ,

संभलकर चलना फिर गिरना जीवन की कला है,
इसी कला के अवशेषों पर जीवन की कहानी लिऐ फिरता हुँ,
गिरता हुँ उठता हुँ फिर संभलकर…………………2

गैरो की क्या बिसात मै अपनो के रूप मे
जहरिला खंजर अपने हाथ लिए फिरता हुँ
निज आदर्शों की बंजर पर
नव सर्जित सपनो का संसार लिऐ फिरता हुँ
गिरता हुँ उठता हुँ………………………..3

बचपन मे माँ ने ललचाया था एक निबाले की खातिर
उस चाँद को पाने की आस लिए फिरता हुँ
खोल देता हुँ खुद को अपनत्व के आगे
उसी अपनत्व मे अपनी हार लिए फिरता हुँ,
गिरता हु उठता हुँ …………………………………………..4

हारता हुँ अपनो से फिर भी उस हार मे भी
अपनो को साथ लिए फिरता हुँ,
मुखोटो की दुनिया मे लोग बदलते है किरदार अपना
वक्त से साथ,
इन बदलते चहरो मे अपनी पहचान लिए फिरता हुँ ।——————5
समाप्त
राहुल आरेज

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