शीत

# -आनंद वर्धक छंद_
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2122 2122 212
सनसनाती है हवाएँ शीत की।
ये कहानी कह रही है प्रीत की।

राह सूनी शांत-सी है चुप खड़ी।
पेड़ की भी आखिरी पत्ती झड़ी।
पत्तियों पर ओस की बूंदे जमी
रात की बीमार परछाई पड़ी।
याद अब आने लगी है मीत की।
सनसनाती है हवाएँ शीत की।

है हवा में धुंध की चादर तनी।
हर दिशाएँ ऊँधती-सी अनमनी
सूर्य रथ का बावरा घोड़ा डरा-
धूप कमसिन हो गई है गुनगुनी।
कह रही कोई कहानी जीत की।
सनसनाती है हवाएँ शीत की।

इस धरा पर रूप की सरिता बहे।
वाटिका रंगी हथेली बिन कहे।
कोहरे में सब तिलिस्मी जैसा लगे-
कल्पना की तूलिका कविता गहे।
धुन सुनाई दे रही संगीत की।
सनसनाती है हवाएँ शीत की।
-लक्ष्मी सिंह
नई दिल्ली

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