कविता · Reading time: 1 minute

शीतलहर

धूप में भी कहर देखो,
पूस का शीतलहर देखो |
माघ अभी बाकी है,
घाघ अभी बाकी है |
शीतलहरों का ,
बाघ अभी बाकी है |

सुबह होती अंगड़ाईयों से,
चाय की चुस्कीयों पे ,
शाम हो जाती है |
कल्पित हर काम ,
शेष रह जाती है |

सून्न कर देती हाथों को,
वो रात अभी बाकी है |
प्रभावहीन होती ,
आग अभी बाकी है |
माघ अभी बाकी है,
घाघ अभी बाकी है |

–पवन कुमार मिश्र’अभिकर्ष’

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