शिव कुमारी भाग ८

दादी ने कभी घड़ी नही पहनी। घड़ी पहन भी लेती तो भी उसमे लिखे अंक और संकेत वो समझ नही पाती।

फिर भी समय की सुई उनके मस्तिष्क मे निरंतर चलती रहती।

खपरैल की छत के किनारों से उतरती छांव, जब घर के चौक पर पसर जाती, दादी उसको देखकर बता देती कि अभी कितने बजे है।

उनसे समय पूछ कर जब घड़ी से मिलाते तो आश्चर्यचकित हो जाते कि कैसे वो एक दम सही वक्त बता देती है।

चांदनी रात मे कुछ तारे उनके ठीक ऊपर आके खड़े हो जाते और एक आध नीचे की ओर सरक कर उनको इशारा कर देते कि अभी रात के दस बजे है।

ऐसा लगता कि समय ,तबले की तीन ताल सा उनके मस्तिष्क मे बजता रहता है।

एक बार एक संगीत के शिक्षक को कहते सुना था कि गाते वक़्त तबला न भी बजे तो वो तबले की थाप को महसूस कर लेते हैं, फिर गाना उसी रफ्तार मे चढ़ता उतरता रहता है।

दादी के साथ भी कुछ ऐसा ही रहा होगा, उन्होंने भी अपने अंदर कुछ ऐसा ही सामंजस्य बना रखा होगा कि समय उनकी आंखों के बिल्कुल करीब से होकर ही गुज़रता।

अंग्रेजी की तारीख और महीनों से उन्हें कोई सरोकार न था, उनके अपने चैत्र , बैशाख , कृष्ण, शुक्ल पक्ष , तिथियाँ, घड़ी और प्रहर को, वो अपने पल्लू मे गांठ बांधे रखती और पूछने पर उन्हें खोल कर बता देती।
माँ को दस पंदरह दिन पहले ही बता देती कि आने वाली फाल्गुन की कृष्ण पक्ष की चतुर्थी को मेरी पड़दादी का श्राद्ध है।

दो साल पहले होली मंगलवार को थी कि बुधवार को, उन्हें पता नही कैसे सब याद रहता था।

चंद्र और सूर्य ग्रहण के समय भी ,वो ठीक कुछ पहले ही खाने पीने के सामान मे तुलसी के पत्ते या कुशा के तिनके डाल देती। ग्रहण चलते वक्त अपने आसन पर बैठ कर माला जपती रहती। ग्रहण उतरते ही नहा धोकर, घर के सभी कोनों मे, गंगा जल छिड़क कर, गरीबों को दान देने घर की दहलीज पर बैठ जाती,

उनके एक कतार मे नही खड़े होने पर गालियां भी देना शुरू कर देती।

किसी ने बता रखा था कि ग्रहण के बाद गालियां देने मे कोई दोष नही लगता।

दोपहर मे कभी झपकियां ले रही होती तो हम इस अवसर का लाभ उठाकर इधर उधर होने की कोशिश करते तो जरूर थे ,पर अगले ही क्षण पकड़े भी जाते।

दो चार कदम बढ़ते ही पीछे से एक आवाज़ आकर पकड़ लेती,

“मरजाणा, इत तावड़ा म कठ चाल्यो”।
(बदतमीज़, इतनी धूप मे कहाँ निकल रहे हो)

ये सुनते ही कदम खींच कर, एक बल्लेबाज की तरह क्रीज़ मे लौट आना पड़ता।

आस पड़ोस मे जाने पर भी उनको चैन नही था, अपने कान वो घर पर ही छोड़ जाती थी, जो कमबख्त उनको घर की गतिविधियों का प्रसारण करते रहते थे, कि कोई बच्चा तो जरूर है , जो टीन की छत पर चढ़ा किसी खुराफात की फिराक मे है।

पड़ोसी के घर से ही एक बुलन्द आवाज़ उभरती, जो कोई भी है चुपचाप अतिक्रमण वाले क्षेत्र से तुरंत लौट जाए वरना दादी छड़ी लेकर हाज़िर हो रही है।

सुबह चार बजे ही उठकर, बिस्तर पर लेटकर या बैठकर , तरह तरह के भजन गाकर खुद के साथ ,भगवान को भी जगा देती।

उनके गाने से तब किसी की भी नींद नही खराब होती , बल्कि ये पता चलता कि सुबह होने वाली है।

शाम को भजन गाकर ही भगवान को शयन भी कराती। भगवान भी सोचते होंगे, कि इनसे कौन माथा खपाये इसलिए वो भी चुपचाप सो जाते थे।

हमारी दिनभर की हालत वो भी देखते रहते थे।

दादी की विचित्र शक्तियां और भी थी। घर से लगभग दो किलोमीटर दूर सीटी की आवाज़ सुनकर वो बता देती की कौन सी ट्रेन आयी है, इधर वाली या उधर वाली या फिर कोई मालगाड़ी गुज़री है।

उनके जासूस रेल की पटरियों पर भी तैनात थे शायद।

एक बार रात के ८.३० बजे दादी ने एलान कर दिया कि” टाटा पटना ” ट्रेन आ चुकी है। भाई साहब उसी ट्रेन से टाटानगर से घर आ रहे थे। ट्रेन आने के २० मिनट के बाद भी जब वो घर नही आये, तो किसी ने कह दिया,

दादी तुम्हारे कान अब ख़राब हो गए है, ट्रेन नही आई होगी , नही तो भाईसाहब कबके घर आ गए होते।

दस मिनट बाद, दरवाज़ा खटखटाने की आवाज़ हुई।

दरवाज़ा खोलते ही भाईसाहब घर के अंदर दाखिल हुए, जाड़े की रात मे ठंड की वजह से स्टेशन पर रिक्शा नदारद था, पैदल चल कर आये थे , इसलिए इतना समय लग गया।

दादी उनको आशीर्वाद देकर, फौरन उस तरफ देखने लगी, जहां से कान खराब वाली टिप्पणी आयी थी, गालियों की बौछार के डर से पहले ही वो आकृति लालटेन की कम रोशनी का लाभ उठाकर दूसरे कमरे मे दुबक के बैठ चुकी थी।

एक आवाज़ गूंजी-

” रामार्यो, कठ गयो बो, बोल्यो दादी का कान खराब होग्या”
(अरे मूर्ख, कहाँ हो तुम, कह रहे थे दादी के कान खराब हो गए)

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