शिव आराधना

शिव आराधना
(१)
एक हाथ में डमरू धारे ,दूजे कर में त्रिशूल बिराजे।
गले बिच सर्पों की माला ,मन मोहते गाजे और बाजे।।
सिर पे चंदा को धार्य किये ,गंगा का उद्गम है तुमसे –
बन नीलकंठ विषपान किया,माथेपे तीजी आँख साजे।
(२)
तुम रूद्र रूप ,तुम अधिनायक ,जग के पालनहारे तुम हो ,
तन भस्म सोहे,मन भक्ति मोहे जब क्रुद्ध भये तब तांडव हो।
जग के पालक,तुम विध्वंशक,असुरों के संहारक तुम –
भोले हो भोले-भंडारी ,शक्ति रूप, अर्द्ध-नारिश्वर तुम हो।

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साहित्यिक नाम-अटल मुरादाबादी विधि नाम-विनोद कुमार गुप्त शिक्षा-बी ई(सिविल इंजी०) एम०बी०ए०,एम०फिल(एच आर एम) सम्प्रति -सरकारी...
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