शिक्षित और अशिक्षित का सही अर्थ व भेद

शिक्षित और अशिक्षित का सही अर्थ व भेद
शिक्षित से हमारा अभिप्राय उस व्यक्ति से है जो पढ़ना लिखना जानता हो । सामान्यतः जब एक सात वर्ष उससे बड़ी उम्र का बच्चा पढ़ना लिखना जानता हो तो उसे शिक्षित कहा जाता है और यदि वह पढ़ना लिखना नहीं जानता हो तो उसे अशिक्षित कहा जाता है । सीधे अर्थों में शिक्षित एक पढ़ा-लिखा व्यक्ति और अशिक्षित एक अनपढ़ व्यक्ति कहा जाता है । शिक्षा की यह परिभाषा अनेक शोध एवं शिक्षाविदों के विश्लेषण के पश्चात दी गई है । शिक्षा एक निरंतर सीखने की प्रक्रिया मानी गई है । व्यक्ति जीवन भर कुछ नया सीखने में लगातार प्रयासरत रहता है । देखा जाए तो इस परिभाषा के अनुसार यदि केवल पढ़ने और लिखने वाले व्यक्ति को शिक्षित माना जाए तो इसका अर्थ है कि इतिहास के पन्नों में जिन महान व्यक्तियों ने अक्षरो की पढ़ाई नहीं की वो सभी अशिक्षित व अनपढ़ कहे जाएगें । उनके नामों के सामने महान शब्द की बजाए अशिक्षित शब्द कितना शर्मनाक में अशोभनीय होगा । वास्तव में उन सभी व्यक्तियों को महान उनकी पढ़ने व लिखने की कला ने नहीं बनाया बल्कि वो लोग सोचने-समझने, व लोगों के प्रति उदार हृदय रखने से महान बने हैं । इस बात में कतई शक नहीं कि सभी पढ़े-लिखे लोग पूर्ण रूप से शिक्षित नहीं कहे जा सकते । क्योंकि
शिक्षित का अर्थ मात्र वर्णमाला व गिनती सीखने से नहीं है बल्कि वह बुजुर्ग व्यक्ति जो समाज में दूसरों को अच्छे संस्कारों की सीख दे रहा है , जिसने कई पीढ़ियों तक संस्कार-शाला में बच्चों को सही और गलत का ज्ञान देकर उन्हें उच्च अधिकारी बना दिया वास्तविक रूप से शिक्षित है । सवाल यह उठता है कि क्या वह व्यक्ति अशिक्षित कहा जा सकता है? मेरी माने तो वास्तव में अशिक्षित व्यक्ति वह है जो पढ़ने लिखने के ज्ञान के पश्चात भी समाज की मुख्यधारा में शामिल ना हो । जो दूसरों द्वारा दिए गए ज्ञान को सही ढंग से व्यवहार में लागू ना कर सके । उस पढ़े लिखे व्यक्ति को भी शिक्षित नहीं कहा जा सकता जो बीच बाजार लूटपाट ,चोरी, गाली-गलौच व असभ्यता के मार्ग को अपनाता है । यदि वह समाज में संस्कारों और मानव मूल्यों को नहीं समझ सकता तो उसे शिक्षित कहना कहां तक उचित है । फिर तो वह व्यक्ति शिक्षित कहलाने के योग्य ज्यादा है जो पढ़ा लिखा ना होने के बावजूद दूसरों का सम्मान करता हो ,मधुर वाणी से सबका प्रिय कहलाता हो ,बड़े बुजुर्गों की सेवा करता हो , अच्छे और बुरे में भेद कर सकता हो ,समाज में महत्वपूर्ण निर्णय लेने में अपनी भूमिका निभाता हो व जिसको सभी व्यक्ति सम्मान देते हो । वर्तमान शिक्षा प्रणाली तकनीक और भौतिकवाद पर ज्यादा बल देती है । बच्चों को उन विषयों में शिक्षित करने पर ज्यादा बल दिया जाता है जो रोजगारपरक व आर्थिक आवश्यकताओं को पूरी करते है। इस शिक्षा प्रणाली में धीरे-धीरे बच्चों के नैतिक मूल्यों व ज्ञान और संस्कार की कमी होती जा रही है । आज शिक्षा केवल पढ़ाई पूरी करके अच्छे संस्कार स्वरोजगार तक सीमित हो गई है । बच्चों में गुरुजनों के प्रति आदर भाव, प्रेम , माता- पिता का सम्मान , सेवा व नैतिक मूल्यों का पतन हो रहा है । वर्तमान में बच्चा माता-पिता के साथ- साथ अपने गुरुजनों के चरण स्पर्श करने में भी ग्लानि महसूस करता है क्योंकि सीख देने वाली कहानियों की अपेक्षा उसे विदेशी भाषा सीख कर भौतिकवाद पर ज्यादा जोर देने के लिए कहा जाता है । मेरी मानो तो उस व्यक्ति को शिक्षित करना यथोचित गलत नहीं जो एक दिन भी शिक्षा के मंदिर में शिक्षा ग्रहण नही करने गया हो लेकिन दूसरे बच्चों में अच्छे संस्कारों का विकास करने के लिए जिसमें कई शिक्षण संस्थान खोल दिए जहाँ गरीब व असहाय बच्चों को मुफ्त शिक्षा दी जाती है । अशिक्षित शब्द को केवल वर्णमाला पढ़ने व लिखने से नहीं जोड़ना चाहिए । यह जरूरी नहीं कि शिक्षा केवल पढ़ कर या लिख कर ही ली जाए । प्राचीन समय में तो शिक्षा गुरुकुलों में मौखिक ज्ञान देकर व प्रयोगात्मक तरीके से ही दी जाती थी । वर्तमान परिपेक्ष में इस बात को जानना अत्यंत आवश्यक है कि कौन शिक्षित है और कौन अशिक्षित । मेरे स्वरचित लेख के माध्यम से मैंने शिक्षित और अशिक्षित की विश्लेषणात्मक व्याख्या की है जिससे शिक्षित और अशिक्षित को समझना और भी आसान हो जाएगा । समाज सुधार एवं शिक्षा के क्षेत्र में अपने लेखों के माध्यम से जन-जन को शिक्षित बनाने के लिए लगातार प्रयासरत रहूंगा ।

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