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समझता हूँ

Rishav Tomar (Radhe)

Rishav Tomar (Radhe)

कविता

March 17, 2017

तेरे लव से निकलती हर जुबां को में समझता हूँ
तेरे खामोस होने की वजह भी में समझता हूँ
क्यों यारा तुम नहीं समझी मेरे दिल की तमन्ना को
तुम्हे मैं जान अपनी जान से ज्यादा समझता हूँ
तेरी यादे को बातें को जहन में मैं सजोये हूँ
भले खामोस हूँ लेकिन निगाहों में बसाये हूँ
कोई कुछ भी कहे यारा मुझे कोई फ़िकर है न
तुम्हे मैं जान मोहन का चेहरा समझता हूँ
तुझे चन्दा तुझे तारा तुझे सब कुछ समझता हूँ
जला है घर मेरा वो जलना समझता हूँ
तुम्हे अपना बताने की है मजबूरी समझता हूँ
तुम्हारा पास तो बैठा हूँ मगर दूरी समझता हूँ

Author
Rishav Tomar (Radhe)
ऋषभ तोमर अम्बाह मुरैना मध्यप्रदेश से है ।गणित विषय के विद्यार्थी है।कविता गीत गजल आदि विधाओं में साहित्य सृजन करते है।और गणित विषय से स्नातक कर रहे है।हिंदी में प्यार ,मिलन ,दर्द संग्रह लिख चुके है
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