Jun 27, 2016 · कविता
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शायद मैं ना जागूँ एक दिन

शायद मैं ना जागूँ एक दिन…..
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शायद मैं ना जागूं एक दिन,
साँसें जब ये रुक जाए ।
लहू की तीव्र गति रुक जाए
धड़कन दिल की थम जाए ।।
शायद मैं ना जागूँ एक दिन………

उस दिन मेरा नाम जुबाँ पर,
हर कोई के आ जाए ।
मेरी भी एक जीवन गाथा,
इस दुनियाँ में छा जाए ।।
शायद मैं ना जागूँ एक दिन…………

चिर निद्रा में ऐसे सोऊँ,
करवट भी जब ना आये ।
तब मेरे हर कृत्य के चर्चे,
हर एक तबके से आये ।।
शायद मैं ना जागूँ एक दिन…………

जीवन को मैं अब जाना हूँ,
ऑक्सीजन को पहचाना हूँ ।
जन्म मेरा कलयुग में होकर,
सतयुग में मृत्यु आये ।।
शायद मैं ना जागूँ एक दिन…………..

सृष्टि में आच्छादित भय की,
नाम निशाँ तक क्षय हो जाए ।
जन जन को अधिकार मिले,
हर तबके में साधन हो जाए ।।
शायद मैं ना जागूँ एक दिन…………..

मानस में ज्ञान के दीप जले,
संरक्षित जीवन हो जाए ।
चोरी भ्रष्टाचार लूट सब,
मेरे रहते बंद हो जाए ।।
शायद मैं ना जागूँ एक दिन………….

सामरिक अरुण
देवघर झारखण्ड
17 मार्च 2016

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Arun Kumar
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