कविता · Reading time: 2 minutes

” शायद तु बेटी है ! “

ना जाने किस मिट्टी की तु गड़ी है ,
तु किसमत की कितनी धधी है ,
सारी रश्में – कसमें तेरे लिए ही है ।
शायद तु बेटी है !
इसलिए सिर्फ तु ही बेडियो से बंधी है ।

अपने बलिदानों से तु धनी है ,
दहेज के लिए भी तु जली है ,
नरक का द्वार भी बनी है ।
शायद तु बेटी है !
इसलिए सिर्फ तु ही बेडियो से बंधी है ।

तु तो नारी है ना !
तु तो नर के संभोग के लिए बनी है ।
कभी मेनका तो कभी दुर्गा बनी है ,
लज्जा की घुंघट से तु ढकी है ,
तु तो सिर्फ अतित की कहानियों में छुपी है ।
शायद तु बेटी है !
इसलिए सिर्फ तु ही बेडियो से बंधी है ।

एक ही जिंदगी में तु कई जन्म लेने के लिए बनी है ,
हर जन्म तेरे लिए इम्तिहाँ की घड़ी है ।
सौदागरों के बीच तु सौदा बन खड़ीं है ,
बहुत ही नासमझ हैं तु ,
तभी तो तु जननी बनी है ।
शायद तु बेटी है !
इसलिए सिर्फ तु ही बेडियो से बंधी है ।

तेरा तो कोई सपना ही नहीं ,
तु खुद सब का सपना बनी है ।
जन्म ले कर किसी की बेटी है ,
कुछ सालों में तु खुद मां बनी हैं ।
वो बड़ा किसमत का धनी है ,
जिसके लिए तु बचपन से देखे सपने छोड़ ,
फिर से नए सपने बुनने चली है ।
शायद तु बेटी है !
इसलिए सिर्फ तु ही बेडियो से बंधी है ।

बड़े कमजोर दिल की तु बनी हैं ,
हर पल खुद से लड़ी है ।
टूट कर भी तु बड़े लचीलेपन की छड़ी है ,
मोम सी पिघल जाती हैं तु ,
देखे जब तु किसी के आंखो में नमी है ।
शायद तु बेटी है !
इसलिए सिर्फ तु ही बेडियो से बंधी है ।

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