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शाम डरते हुए

बेशर्म की कलम से

शाम डरते हुए

रोज कितने मुख़ौटे लगाता हूँ मैं।
हर रिश्ते को दिल से निभाता हूँ मैं।।

तुम जिन्हें चाँद तारे या सूरज कहो।
उनको शाला में नित ही पढ़ाता हूँ मैं।।

पूछते लोग खुशबू ये कैसी कहो।
तेरी यादों से अक्सर नहाता हूँ मैं।।

शेर बनकर फिरूँ सारे जग में मगर।
शाम डरते हुए घर को आता हूँ मैं।।

कहने को बेशरम हूँ मगर जाने क्यों।
बेसबब याद सबको ही आता हूँ मैं।।

विजय नामदेव “बेशर्म”
गाडरवारा मप्र
09424750038

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विजय कुमार नामदेव
विजय कुमार नामदेव
कल्याणपुर
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सम्प्रति-अध्यापक शासकीय हाई स्कूल खैरुआ प्रकाशित कृतियां- गधा परेशान है, तृप्ति के तिनके, ख्वाब शशि...
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