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शादी

शादी के दिन चार बचे थे
मन था बड़ा बेचैन,
कैसे कर ये दिन बीतेंगे
दिल पायेगा चैन।
सोच- सोच में थे दिन बीते
शादी के दिन चार,
शादी हुई और आई दुल्हन,
लाई संग बहार।
मन मगन तन झुम रहा था
देख प्रिय का रुप।
पाकर संग मैं उनका जैसे
बन बैठा था भूप।
क्या दिन थे उस वक्त यहाँ
सबके आंखों का तारा था
संगी – साथी भैया – भाभी
सबका ही मैं दुलारा था।
लेकिन नाजाने यह सपना
कब और कैसे टूट गया।
आज तो ऐसा लगता जैसे
भाग्य ही हमसे रूठ गया।
आज सोचता हू पीछे मूड़
क्या वो खुशी जरुरी थी,
क्या खुशीयो को जान सका तब
या वो सोच अधूरी थी।
जो तब प्रेम से हमें बुलाती
आज झगड़ती जाती हैं,
काम करूँ चाहे मैं जितना
क्यों बेकार बताती हैं।
तब था मैं आजाद परिंदा
आज पंख ही टूट गये।
ऐसा लगता है खुशीयों की
डोर हाथ से छूट गये।
©®पं.संजीव शुक्ल “सचिन”
9560335952

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पं.संजीव शुक्ल
पं.संजीव शुक्ल "सचिन"
नरकटियागंज (प.चम्पारण)
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D/O/B- 07/01/1976 मैं पश्चिमी चम्पारण से हूँ, ग्राम+पो.-मुसहरवा (बिहार) वर्तमान समय में दिल्ली में एक...