गज़ल/गीतिका · Reading time: 1 minute

शादी का बवाल

**शादी का बवाल (ग़ज़ल) **
****222 221 211 22****
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मन मे शादी का सवाल न आए,
जीवन मे भी ये बवाल न आए।

मन की मरजी मार रहे खाती,
दिल मे ऐसा भी उबाल न आए।

देती हैं जड़ से बदल भर्या वो,
ज्वाला रूपी ये जवाल न आए।

पति बन कर लाज दांव जनाब,
दम मरता हो अस्पताल न आए।

भार्या बीमारी दवा न बनी हैं,
बिन दारू कोई पियाल न आए।

मनसीरत मन में मरे सब स्वप्न,
ख्वाबों में वीरान ख्याल न आए।
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सुखविंद्र सिंह मनसीरत
खेड़ी राओ वाली (कैथल)

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सुखविंद्र सिंह मनसीरत कार्यरत ःःअंग्रेजी प्रवक्ता, हरियाणा शिक्षा विभाग शैक्षिक योग्यता ःःःःM.A.English,B.Ed व्यवसाय ःःअध्ययन अध्यापन अध्यापक शौक ःःकविता लिखना,पढना भाषा ःःहिंदी अंग्रेजी पंजाबी हिन्दी साहित्यपीडिया साईट पर प्रथम रहना प्रतिलिपि…
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