शहर से गुज़रे तो भटके हुए चेहरे मिले

शहर से गुज़रे तो भटके हुए चेहरे मिले
कुछ ढूँढने ज़मीं तक लटके हुए चेहरे मिले

होता कोइ हमदर्द कोइ हमनवां तो फिर क्यूँ
हर संग पे सर को पटके हुए चेहरे मिले

पलकों का मोहल्ला बह गया बरसातों में
ज़ीस्त की गली से फटके हुए चेहरे मिले

हसरत का परिंदा है परवाज़ को तैयार
किन झाड़ियों में ये अटके हुए चेहरे मिले

सूरत से तो उनकी कुछ ज़ाहिर न हो सका
नज़र में जाने क्यूँ खटके हुए चेहरे मिले

मौसम जिस शहर के बेअसर हाय हो चले
नूर की बूँदों से झटके हुए चेहरे मिले

उठे थे दिल की गहराईयों से लब तक ‘सरु’
उन नगमों के हाय चटके हुए चेहरे मिले

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