शहर-ए-इश्क़

शहर-ए-इश्क़ में हर शक़्स हैरान सा लगता है,
कड़वी किसी की बात,दर्द मुस्कान सा लगता है,

इश्क़-ए-दरिया में गोते खाता है कोई,
तन्हाई में दिल किसी का बियाबान सा लगता है,

कितना कुछ छुपाता है इंसान ज़माने से यहाँ,
दर्द सीने में और आंखों में तूफ़ान सा लगता है,

दिल को धड़कनें का यहाँ बहाना ढूंढता है कोई,
कोई मोहब्बत में यहाँ परेशान सा लगता है,

इश्क़ करता है कोई किसी से बेहिसाब यहां,
किसी का दिल पत्थर बेज़ान सा लगता है,

किया है गर इश्क़ तो नफ़ा क्या देखना,
हर किसी को इस धंधे में नुकसान सा लगता है,

कितना भी मोहब्बत दिखाएं किसी को,
ये दिल सदा उनको तालिबान सा लगता है,

मंजिल कोई नई नजर आती नही “विनय”,
देखकर आईना भी हमें हैरान सा लगता है,

– विनय कुमार करुणे

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