शहरी व ग्रामीण जीवन

मैं ग्राम का हूँ
मैं शहर में भी हूँ
अधिक दूर नहीं मैं
ग्राम से औ’ शहर से
ग्राम जिन्दगी मनभावन है
वो बचपन जो
बीता है मेरा ग्राम में
नहीं भूला हूँ मैं
नीम की डारि पर चढ़ना
दातून तोड़कर दंत घिसना
नहीं भूला हूँ मैं
उठते खगों की चहचहाहट
नदी का वो कलरव
नहीं भूला हूँ मैं
वो लहलहाते खेत
वो शबनम की बूँदे
नहीं भूला हूँ मैं
सं सखाओं के गिल्ली-डंडा खेलना
वो उनसे लड़ना-झगड़ना
नहीं भूला हूँ मैं
वो माखन की डलियाँ
औ’ मोहल्ले की गलियाँ
नहीं भूला हूँ मैं
ये जीवन ग्राम का
जो बरबस सबकी
आँखों में बसा रहता है
पर एक पहलू भी है
जो नहीं भूला जा सकता
उन रूढ़िवादी विचारों को
जो ग्राम में ही पनपते हैं
ऊँच-नीच, भेदभाव की जडे़ं
ग्राम में ही फूलती हैं
कभी तो ये जंजीरें
इतनी मोटी होती हैं
कि कसक जाती है
इनमें वे ग्राम कन्याएँ
बंधन अनंत उनकी
प्रगति को थाम देते हैं
अ अनार तक सिमट जाती है
उनकी जिन्दगी भी
ये भी ग्राम जीवन ही है
जहाँ टीस उठती है
शोषितों की
आज भी दबंग नजर आते
हैं गलियों में
जो दबा देते हैं
चीख निर्बलों की
ये ग्राम का वो तथ्य है
जो नहीं अछूता है
इन आँखों से
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मानता हूँ शहर में
संस्कार उड़ते हैं
मुखरता सिर उठाती है
शहर में
वातावरण भी दूषित है
शहर में
पर एक दलित भी
क्यूँ लेता है खुली साँस
शहर में
क्यूँ मानता है
कि अब मैं मुक्त हूँ आकर
शहर में
क्यूँ लड़कियाँ बढ़ जाती है आगे
आकर शहर में
क्यूँ टूट जाती हैं
रूढ़िवादी बेडि़याँ आकर
शहर में
क्यूँ जात का बंधन
नहीं रहता आकर
शहर में
शहर हो या ग्राम
सब अपनी जगह हैं
यह तो मनुष्य ही है
जो जहाँ रहता है
वहाँ का माहौल
बदल देता है
जीवन शहर का हो
या ग्राम का
विचारों की पवित्रता ही
भूमिका निभाती है।
?सोनू हंस?

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