कविता · Reading time: 1 minute

शर्मिंदा हूं मैं

हां सांसे थोड़ी कम- सी हैं ….
हां आंखें थोड़ी नम- सी है… थोड़ी सी टूटी -टूटी हूं…
खुद से जो रूठी -रूठी हूं …
मरे -मरे इस जीवन में… बस थोड़ी -सी जिंदा हूं मैं…
औरों के लिए खुद को खो दी… इस बात पर शर्मिंदा हूं मैं….
अभी तो बस एक मोड़ लिया है….
जीवन रूपी माया ने….
मुझे अकेला छोड़ दिया है…
मेरी ही अनु छाया ने…
मेरे ही तीरों के तरकश…. अब मुझ को छलनी करते हैं… अपने ही करनी -भरने मैं …
बस वक्त को जाया करते हैं… अभी तो पटकी खाई है …. इन विश्वासों के खटको से..
अभी तो मेरी आंख खुली है सच्चे झूठे इन झटकों से …
खुद को देखक लज्जित होती खुद की ही निंदा हूं मैं
औरों के लिए खुद को खो दी इस बात पर शर्मिंदा हूं मैं….

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