कविता · Reading time: 1 minute

शराब एक अभिशाप

मर रही है जनता भूख से,
उन्हें कुछ निवाला चाहिए।
त्राहिमाम के ही शोर का,
क्या उन्हें बोलबाला चाहिए।

न समझ सके दुःख तनिक,
बस खोल दी है मधुशाला
भूखा बैठा है बच्चा घर,
और बाप हुआ मतवाला।

घरनी के भाग भी फूट गए,
ये विपदा भी ऐसी आई।
पिता बसे मधुशाला में,
परेशान है घर में माई।

भूख मिटाने को बच्चे की,
दर-दर देखो भटक रही।
जहाँ कभी नहीं देखा था,
वो वहाँ भी माथा पटक रही।

दे दो मुझको कुछ अन्न ज़रा,
घर में मेरा लल्ला भूखा है।
देने वाले भी बहुत हैं पर,
बहुतों का मन भी भूखा है।

शब्दों पर ध्यान नहीं देते,
बस नजर गड़ी है अस्मत पर।
सरकार यही क्या चाह रही,
पछताए गरीब किस्मत पर।

मुझको होता है दुःख इतना,
पर कर भी नहीं कुछ पाता हूँ।
आखिर तो मैं भी हूँ उसमें,
खुद में गरीबी ही पाता हूँ।

✍🏻पंडित शैलेन्द्र शुक्ला
📝writer_shukla

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