*शराफ़त नहीं है कमज़ोरी*

शराफ़त का घुट घुट कर मरते जाना
धोखे का यूं बस मचलते ही जाना
बेचकर ईमान बस इठलाते ही जाना
शराफ़त नहीं है कमज़ोरी ये मैंने अब जाना

क्या गुनाह है ये शराफ़त भरा दिल रखना
दूसरों की भावना को खुद से पहले सोचना
मत समझो इसे यूं कमजोरी किसी की
शरीफ़ होना है ये ईनायत खुदा की

यूं न खेलो किसी के दिल से तुम इंसां
कि ये जिंदगी है बस दो दिन की ही मेहमां
शराफ़त में जिसने बितायी ज़िन्दगानी
उस पर सदा है ईश्वर की मेहरबानी

क्षण भंगुर हैं ये धोखे की कमाई
लाख करे कोई कितनी भी चतुराई
उसके घर में होती है सबकी सुनवाई
क्यों इंसां तूने यूं ही ये ज़िन्दगी गंवाई
नहीं हारा वो इंसां जिसने ये शराफ़त कमाई

शराफ़त नहीं है तेरी कमज़ोरी ऐ इंसां
क्षमा माँग लेना और क्षमा कर देना
गुण होने किसी में ये नहीं हैं आसां
दिल में राज़ ये गहरे छुपाना
चुप होकर होंठों पे पहरे लगाना
नहीं है ये वश में किसी और के ऐ इंसां

कायम रख ये शराफ़त तू अपनी
साफ़ दिल है तेरा..लिख डाल तू किस्मत अपनी
धोखे से टूटे ना तेरी ये सुंदर विचारों की माला
शराफ़त से कर दे तू सबकी ज़िन्दगी में उज़ाला
कि ये ज़िन्दगी है बड़ी ही खूबसूरत सांसों की माला

©® अनुजा कौशिक

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