शरद पूर्णिमा का प्रेम अमृत

पावस संग चले गए बदला, शरद ऋतु है आई
स्वच्छ हुआ है नील गगन, पूर्ण चंद्र मन भाई
शरद पूर्णिमा का प्रेमामृत, मन को रहा लुभाई
सप्त स्वरों में प्रेम की बंशी, अंतर्मन रहा बजाई
कब आओगे कृष्ण कन्हाई, मधुबन रहा बुलाई
नाच उठा है मन मयूर, पिया मिलन को हरषाई
महारास के इंतजार में, नयनन नींद चुराई
शरद चंद्र के उत्सव में, सुध बुध सब बिसराई
सुरेश कुमार चतुर्वेदी

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