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शब्द

शब्द जीवन्त होते हैं
और कालजयी भी
पर यह क्या हो गया है
शब्दों की संस्कृति
मर रही है
शब्द अब
घबड़ाने लगे है
प्रयोग की मार्मिक वेदना
उन्हें
विवश कर रहा है,
पलायन के लिए-
शब्दों की असामयिक मौत
होने लगी है
शब्द
सदमे में हैं
और
प्रतीक्षा कर रहे हैं
नए
जीवन की
नव प्रयोग की।

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डा. सूर्यनारायण पाण्डेय
डा. सूर्यनारायण पाण्डेय
लखनऊ
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विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में 1000 से अधिक लेख, कहानियां, व्यंग्य, कविताएं आदि प्रकाशित। 'कर्फ्यू में शहर'...