कविता · Reading time: 1 minute

शब्द नाग बनकर डस लेते है

शब्द नाग बन कर डस लेते समझलो जुबाँ से
इतना तो कोई घायल नहीं करता तीरों कमान से

कहने को सारा सारा संसार अपना सा लगता है
बेपनाह आखँ में पानी आया ये तेरे मेरे दरम्यां से

सदियां गुजर गई पर ये खत्म क्यों नहीं होता है
मिलने पर दूरियां यहाँ भरोसा क़ातिलों के बयाँ से

कब उतरेंगे इस शहर में चेहरों पर लगे और चेहरें
पानी भी सर पर आ चढ़ा अब ख़तरे के निशाँ से

इश्क दुरी घटाता तो नजदीकियों से घबराहट क्यों
खामोश क्यों हो ज़रा जवाब दो सुन मेरी दास्ताँ से

फर्क मेरे और तुममें सिर्फ इतना ही होगा ऐ इश्क
साथ तुम थे सफर कट गया नहीं मुश्किल थकान से

खुद को बेच डाला तूने कैसे ओ मेरे खुदा जाकर कैसे
मन्दिर मस्ज़िद बनी हुई तेरी दुकान से इस दुकान से

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