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"शब्दों से हारी लो आज मैं "

शब्दों से हारी लो आज मैं ,
अवतरित हो मेरी कलम से,
बह चली जो धारा अविरल ,
छोड़ मुझ अकिंचन को ,
जाने किस सागर की ओर चली,
नित्य, शाश्वत ही रही वह,
तोड़ सब बंधन चली,
कौन जाने किस मोड़ पर ,
मिल जाये कभी वह मुझे ,
आज मैं रोक ना सकी उसे,
खोल सारे वो उद्दगार चली,
कंठ में ही रह गये जो शब्द ,
आज वो लेखनी के डोले पर सवार ,
जाने किस भाव से चली,
टूट कर भी जो खड़ी रही,
आज वो दुर्दिन में छोड़ मुझे ,
उन्मुक्त हो विचरण को चली.
…निधि…

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डा0 निधि श्रीवास्तव
डा0 निधि श्रीवास्तव "सरोद"
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"हूँ सरल ,किंतु सरल नहीं जान लेना मुझको, हूँ एक धारा-अविरल,किंतु रोक लेना मुझको"