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शब्दों को बतियाते देखा….

(गीतिका)
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शब्दों को बतियाते देखा,
सारा जग हथियाते देखा ।
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स्नेह सुरों की बलि दे डाली,
कर्कश बन चिचियाते देखा ।
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खूब ठहाके भरते थे जो,
आज उन्हें खिसियाते देखा ।
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सिंहनाद वाली गर्जन को,
पल भर में मिमियाते देखा ।
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पहले पुचकारा जी भर कर ,
फिर सबको लतियाते देखा ।
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हरीश चन्द्र लोहुमी, लखनऊ, (उ॰प्र॰)
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