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व्यंगात्मक कविता आइये कद्रदान

Ashok sapra

Ashok sapra

कविता

February 13, 2017

आइये कद्रदान लेकर आया सियासत की दुकान
झोपड़ियां दूंगा तुमको छीन कर के तुम्हारे मकान

तुम्हारे लहू को जलाकर अपना चरागाँ जलाना है
तुमको बनाने आया हूँ सुखी शाख वाला गुलिस्ताँ

खूब तराशा था गर्दिशों में तुमने भी जिस हीरे को
उसका नहीं रहेगा कभी कही कोई पर भी निशान

तुम्हारी गर्दन पर शिकंजा कसने आया हूँ मैं यारों
मार डालूँगा तुमको मुकर जायेंगे गवाही के ब्यान

तुमको तो सज़ाऐ मौत लाजिमी है इस लोकतंत्र में
मेरे व्यंग के तीखे तीर चलाती मेरी जहरीली जुबाँ

जोश में हो तो आरिया चला देना उस शाख पर
जिस पर बैठे हो तुम सब मेरे देश के मुर्ख जवान

देखो इस कुर्सी का लालच मुझकों भी रहता यारों
मैं भी बिकाऊं हूँ मुझको तो भी बनना नेता महान

धन दौलत मोती रत्न सब तुम्हारे लूट ले जाऊँगा
इस चुनाव मे वोट देना गूंगी अदालत को श्रीमान

अशोक की बातें मत मानो यारो ये कटखना बड़ा
बचपना ऐसे बीता इसका जैसे कटखने हो श्वान

अशोक सपड़ा की कलम से दिल्ली से

Author
Ashok sapra
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