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वो वैश्या

dr. pratibha prakash

dr. pratibha prakash

कविता

August 2, 2016

मैंने एक वैश्या को देवी से ऊपर देखा
एक पण्डित को उसके कदमो में गिरते देखा
समझ न आया फिर भी लेकिन दृश्य ये देखा
मैंने एक वैश्या को …………
रहा न गया पूछा मैंने फिर
ईश्वर बोल पड़ा मुस्कुराकर
एहसान है इस वैश्या का
मुझ पर और समाज पर
जीवित रखा विश्वास जो मुझ पर
भटके हुए हर इंसा का
मन विकल फिर पूछ बैठा कैसे
आँख झुकाये अब वैश्या बोली
मेरे कोठे पर सभ्रांत बन आते
मदिरा पीते गौमांस उड़ाते
मुझे याद पाठ गीता का
कर्मज्ञान से ये थे इठलाते
सभ्य समाज परिवार सभी
विखर जाये यदि मैं न थामूं
चोरी से दिन का समय निकालूँ
जा मन्दिर में ज्ञान सुना था
हैरान हुई देखा इश्वर को
ईश्वर फिर मुस्काया और बोला
यदि सभ्य परिधान ये न देती
नशे में नंगा उनको करती
मुझ पर विश्वास न करता कोई
मन्दिर मस्जिद जाता न कोई
सुने रहते गुरूद्वारे गिरिजा
ज्ञान सभी पोथी में रहता
इंसानियत फिर मर जाती
कोई काम न किसी के आता
इसलिए बनी ये देवी और
दुष्ट ये दानव दल आतंकी राक्षस
कर्म बिधान का लेख यही
शीश झुका समझ चुकी मैं
वैश्या को देवी मान चुकी मैं

यहाँ पण्डित जाति सूचक न होकर किसी भी धर्म का व्याख्याता है

Author
dr. pratibha prakash
Dr.pratibha d/ sri vedprakash D.o.b.8june 1977,aliganj,etah,u.p. M.A.geo.Socio. Ph.d. geography.पिता से काव्य रूचि विरासत में प्राप्त हुई ,बाद में हिन्दी प्रेम संस्कृति से लगाव समाजिक विकृतियों आधुनिक अंधानुकरण ने साहित्य की और प्रेरित किया ।उस सर्वोच्च शक्ति जसे ईश्वर अल्लाह वाहेगुरु... Read more
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