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वो मेरी हस्ती मिटाने को चला

Mahesh Kumar Kuldeep

Mahesh Kumar Kuldeep "Mahi"

गज़ल/गीतिका

July 23, 2016

वो मेरी हस्ती मिटाने को चला
फूंक से पर्वत उड़ाने को चला

यूँ नहीं था ख़ास मक़सद चलने का
सिर्फ अपनी ज़िद निभाने को चला

पैरहन उजला पहनकर, देखिए
दाग़ मुझपर वो लगाने को चला

आसमां छूने की ख़्वाहिश में कहीं
वो जमीं अपनी गँवाने को चला

झूठ के साये में रहता है मगर
साँच का परचम उठाने को चला

माँगकर चिड़ियों से छोटे पंख वो
आसमां पर हक़ जताने को चला

कोई समझाए कहे ‘माही’ उसे
बेवज़ह झगड़े बढ़ाने को चला

माही / जयपुर

Author
Mahesh Kumar Kuldeep
प्रकाशन साहित्यिक गतिविधियाँ एवं सम्मान – अनेकानेक पत्र-पत्रिकाओं में आपकी गज़ल, कवितायें आदि का प्रकाशन | प्रकाशित साहित्य - गुलदस्त ए ग़ज़ल (साझा काव्य-संग्रह), काव्य सुगंध भाग-3(साझा काव्य-संग्रह),कलाम को सलाम (साझा काव्य-संग्रह), प्रेम काव्य सागर (साझा काव्य-संग्रह), अनुकृति प्रकाशन, बरेली... Read more
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