"वो भी क्या दिन थे"

वो भी क्या दिन थे।
जब हम सज संवर कर
निकला करते थे।
कुछ कहने- सुनने में
समय व्यतीत किया करते थे
वो भी क्या दिन थे ।
कहाँ कहाँ की बातें होती
सुख और दुःख बाँटा करते
चाट चटोरी और गुपचुप
वो भी क्या दिन थे।
बच्चों की शाम छिन गयी
और बुजुर्गों की सुबह
महिलाओं की वो सतसंगी
वो भी क्या दिन थे।
जाने नजर लगी किस की
सन्नाटे ने पाँव पसारा
घर में सिमट गये सभी
वो भी क्या दिन थे ।
सड़कों का कोलाहल
हाट की रौनक सबको
कौन निगल गया देखो
वो भी क्या दिन थे ।
अपना साया भी अब
देखो ढूँढ रहा हमको
जाने कब टूटे बंधन
वो भी क्या दिन थे ।
©डा·निधि…

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"हूँ सरल ,किंतु सरल नहीं जान लेना मुझको, हूँ एक धारा-अविरल,किंतु रोक लेना मुझको"
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