*वो बचपन के दिन*

वो अल्हड़ सी यादें वो बचपन के दिन ।
जाने कब गुज़र गए वो मस्ती के दिन ।।

ना कोई डर था ना थी कल की फ़िक़्र ।
बस हर पल होता था मस्ती का ज़िक्र ।।

ना समय की कमी थी ना पैसे की चिंता ।
अपने हों या ग़ैर सबसे प्यार था मिलता ।।

हर काम हो जाता था चिन्ता के बिन ।
जाने कब गुज़र गए वो बेफ़िक्री के दिन ।।

वो कागज की कश्ती वो बारिश का पानी ।
याद आई फिर वो बचपन की बातें पुरानी ।।

वो अनजानों से भी दिल से जुड़ जाना ।
आपस के झगड़ों को पल में भूल जाना ।।

जो ना सुनते उनको भी अपनी बातें सुनाना ।
डांट देता कोई तो रूठ के मुँह को फूलाना ।।

वो रोज़ दादी नानी का किस्से कहानी सुनाना ।
काश लौट आए फिर वो बचपन का जमाना ।।

याद बन के रह गई अब तो वो जिंदगी सुहानी ।
जब सुनाती थी दादी नानी परियों की कहानी ।।

ऐ ज़िन्दगी ज़रा ध्यान से सुन जो मैंने कहा नहीं ।
बचपन बेशक़ चला गया बचपना मेरा गया नहीं ।।

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