Jun 10, 2021 · कविता
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वो नारी चमत्कार है

चकित हूं सुन इक बात को,
तुझको तनिक बताऊं तो,
तू कहता है, वो तुझसे है?
मूरख तुझे जगाऊं तो।

हृदय को मर्म कर सदा,
ममता तले तुझे रखा,
सोचे तू वो कमजोर है?
न शक्ति को समझ सका।

है लौ वही तो आग की,
वो मूर्ति है त्याग की,
है शक्ति भी वो प्रेम भी,
वो कौशिकी, वो जानकी।

सम्मान जो न कर सका,
वो है छवि अज्ञान की,
पापी ना जाने नारी ही,
जनन कृता उस प्राण की।

आंसू स्वयं के पोंछ भी,
व्रत तेरे लिए कर सभी,
वो ताप में है चूल्हे पर,
भूखा न सोए तू कहीं।

कुशब्द जो उसे कहे,
वो अंधकार की कृति।
जो नर्क से भी क्रूर है,
वो दंड उसके पाप की।

है अंश को जन्म दिया,
सृजन किया, पालन किया,
वो नारी तुझसे ऊंची है,
ऐ मूढ़ तुझको भ्रम है क्या?

तू नारी को दबाता है,
तू खुद पे जो इठलाता है,
जो बेड़ियां वो खोल दे,
रक्षक तेरा विधाता है।

है वक्त अब बदल भी जा,
ऐ मूर्ख तू सम्हल भी जा,
उस नारी के बिना तनिक,
तू सोच जिंदगी है क्या!

उस नारी का सम्मान कर,
न फिर कभी अपमान कर,
जो सह के भी वो चुप रही,
वो दुख तनिक तू ध्यान कर।

उत्तर ये तू कह पाएगा?
उसकी तरह रह पाएगा?
जीवन उसे जैसा दिया,
क्या खुद कभी सह पाएगा?

आंगन खुद का छोड़ कर,
दूजे का घर सजाएगा?
उसकी तरह दूजे को क्या,
ईश्वर कभी बनाएगा?

वो घर की तेरी छावनी,
है उससे ही तो रौशनी,
अंधेर में भी ज्योत दे,
वो चांद है, वो चांदनी।

जो भूल भी हजार है,
उसका हृदय अपार है,
क्षमा करेगी जा तुझे,
वो नारी , चमत्कार है।

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Nanhi Lekhika
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