Jun 25, 2020 · मुक्तक
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” वो दिन “

वो दिन भी क्या दिन थे ,
आंखों में काजल और होंठों पर लिपस्टिक कम थे ,
मजाक में भी किसी का दिल दुखाने से डरते हम थे ,
एक रूपए के चूरन में भी हम मस्त थे ,
नंगे पांव घूमते हर वक्त थे ,
पेड़ पर से ही पके फल खा कर तन्दरूस्त थे ,
मिट्टी के घरौंदे बना कर खुश थे ,
केले के पत्तों पर भोजन करते अद्भुत थे ,
कठपुतलियों के नाच से ही मन खुश थे ,
एक ही बिस्तर पर सोते दस – दस थे ,
सितारों की गिनती करते नींद में गुम थे ,
इतनी धूप थी फिर भी दिखते खुबसूरत हम थे ।

🙏 धन्यवाद 🙏
✍️ ज्योति

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ज्योति
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